Monday, September 8, 2008

तीन अक्षर


मैंने आख़िर खत लिख डाला
दिल की बात सुना डाला
हाँ, अपना वज़न कुछ कम कर डाला
दर्द--दिल का बयां जो कर डाला
बस तीन ही लफ्जों में इतना कुछ कर डाला
उनके चेहरे की मुस्कराहट वापस ला डाला
सारे गिले शिक्वे मिटा डाला
हमारे तालुक़ात कायम कर डाला
बस तीन ही शब्द में ये सब कर डाला
मरते हैं हम एक बार
मगर कभी कभी जी लेतें हैं दो बार
एहसासों को दबाना मत
कह डाला जो जुबां पर है
आख़िर तीन ही थो लफ्जों का खेल हैं ये
गुज़रे हुए कल को भुला डालो!
भाई से माफ़ी मांग डालो!
लिखो "मुझे माफ़ करो"!

2 comments:

Redgun said...

Whose forgiveness are you askig for?

Kveens said...

Nobody's actually. Was written for a friend to show him how easy it is to say a 'sorry' and make up with loved ones!